चक्रम ने समझा कि हम जो कुछ भी सीखते हैं, उसमें हमारे साथ आस-पास के लोगों का योगदान भी होता है।
यूं तो चक्रम बहुत समझदार है। वह एक अच्छा नागरिक है। लेकिन फिर भी जीवन जीने की तकनीकों को पूरी तरह से नहीं जानता है। इस बार उसने एक मंझे हुए चित्रकार की बात सुनी। उस बात से चक्रम को पता चला कि हम अपने आप में कितने ही कौशल संपन्न हों, लेकिन अधूरे होते हैं। आखिर हमें और हमारी रचना को कौन पूरा करता है? पढ़ते हैं नागरिक चक्रम की इस कहानी में।
- नागरिक चक्रम भाग 13: प्रतिस्पर्धा नहीं स्पर्धा
- नागरिक चक्रम भाग 12: अति धार्मिकता और प्रेम
- नागरिक चक्रम भाग 11: भूमिका
- नागरिक चक्रम भाग 10: बंधुत्व
- नागरिक चक्रम भाग 9: पंद्रह अगस्त
