होम / नागरिक चक्रम भाग 2 : प्रतिक्रिया एवं देखना

बातों के सिरों को जोड़ें तो बनती है नई समझ

नागरिक चक्रम की कहानियां दरअसल एक ऐसे किशोर की कहानियां हैं जो नागरिक बनने की प्रक्रिया में है। उसके मन में तमाम प्रश्न और दुविधाएं हैं। वह यथास्थिति को स्वीकार नहीं कर लेता बल्कि मन में उठ रही दुविधाओं और प्रश्नों के उत्तर खोजने की इच्छा भी रखता है। चक्रम कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है। उसका वजूद है और जरूर है। जब हम अपने भीतर के समाज और व्यवस्था को जानने लगते हैं, तब चक्रम का जन्म होता है। नागरिेक चक्रम की यह शृंखला एक किशोर के नागरिक बनने की कहानियां हैं।

No comments to show.

Similar Posts

  • लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव, संविधान और नेहरू

    नेहरू जिस भारत का स्वप्न देखते थे, उसमें टुकड़ों में बंटे हुए भारत के लिए कोई जगह नहीं थी। उनके मन में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक एक भारत की छवि थी…

  • हिंदी दिवस: राज भाषा निर्माण का संघर्ष

    जिस समय भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आज़ाद हो रहा था और एक नए राष्ट्र के रूप में उसका एकीकरण हो रहा था, ठीक उसी समय पहली बार भारत की राज भाषा और राष्ट्र भाषा का प्रश्न खड़ा हुआ। संविधान सभा में हिंदी और अहिंदीभाषी सदस्यों के बीच लंबी बहस के बाद हिंदी को राज भाषा बनाने पर सहमति बन सकी।

  • जहां लगती थी मजदूरी की भीड़, अब वहां गूंजती है पढ़ाई की आवाज

    खरगोन जिले के भगवानपुरा क्षेत्र स्थित आदिवासी गांव रायसागर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जिस आंगन से बच्चे सुबह-सुबह पिकअप वाहनों में बैठकर मजदूरी करने जाते थे, वहीं से अब बच्चे बैग…

  • 26 जनवरी: उन बहसों को याद करने का दिन

    26 जनवरी वह दिन है जब 1950 में हमारे देश ने संविधान को अपनाया था और एक गणराज्य के रूप में अपनी नई यात्रा की शुरुआत की थी। उस समय तक देश का शासन भारत शासन अधिनियम के संशोधित स्वरूप के माध्यम से चल रहा था। प्रस्तुत है संविधान सभा की बैठकों के अंतिम सप्‍ताह के महत्‍व को रेखांकित करता यह आलेख।

  • नागरिक चक्रम भाग 1: ध्‍यान-बेध्‍यान

    नागरिक चक्रम की कहानियां दरअसल एक ऐसे किशोर की कहानियां हैं जो नागरिक बनने की प्रक्रिया में है। वह प्रश्नों के उत्तर खोजने की इच्छा भी रखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *