होम / नागरिक चक्रम भाग 11: भूमिका
चक्रम ने यह समझा कि समाज के कुछ लोग अति-धार्मिकता और प्रेम जैसे शब्दों के वास्तविक अर्थ को सही ढंग से नहीं समझ पाते, जिसके परिणामस्वरूप अन्य लोगों को भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।है

चक्रम अपनी किताबों को बस परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए नहीं पढ़ता है। उसे इनसे अपने देश-समाज-पर्यावरण के बारे में जानने में मदद मिलती। बाकी के बच्चे शायद उस तरह से नहीं पढ़ते। चक्रम किताबों की बातें पढ़ता और स्कूल की व्यवस्था की तरफ देखता, तो उसे लगता कि अच्छी बातों और हमारे व्यवहार में इतना फर्क क्यों है? चक्रम ने कक्षा में क्या देखा, देखते हैं नागरिक चक्रम की इस कहानी में।

Similar Posts

  • 26 जनवरी: उन बहसों को याद करने का दिन

    26 जनवरी वह दिन है जब 1950 में हमारे देश ने संविधान को अपनाया था और एक गणराज्य के रूप में अपनी नई यात्रा की शुरुआत की थी। उस समय तक देश का शासन भारत शासन अधिनियम के संशोधित स्वरूप के माध्यम से चल रहा था। प्रस्तुत है संविधान सभा की बैठकों के अंतिम सप्‍ताह के महत्‍व को रेखांकित करता यह आलेख।

  • नागरिक चक्रम भाग 6: दर्जी

    नागरिक चक्रम की कहानियां एक ऐसे किशोर की कहानियां हैं जो नागरिक बनने की प्रक्रिया में है। वह प्रश्नों के उत्तर खोजने की इच्छा भी रखता है।

  • संविधान और हम-5 : मौ‍लिक अधिकार

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 से 35 तक नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। भारतीय संविधान के गहन अध्ययनकर्ता मैनविल आस्टिन ने लिखा है, “ऐसा लगता है कि मूल अधिकारों ने भारत में एक नई समानता का सृजन किया है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने में सहायता की है।”

  • संविधान और हम-1 भारतीय संविधान: ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

    भारतीय संविधान को जानने,मानने और अपनाने के लिए ‘संविधान संवाद’ की पहल ‘संविधान और हम’ वीडियो शृंखला की आठ कड़ियों में हम प्रस्‍तुत कर रहे हैं संविधान निर्माण की प्रक्रिया से लेकर महत्‍वपूर्ण प्रावधानों और उसमें हुए संशोधनों का लेखा जोखा।

  • स्वतंत्र भारत का गांधीवादी संविधान

    श्रीमन नारायण अग्रवाल ने गांधी के रामराज्य को परिभाषित करते हुए लिखा है, ‘‘धार्मिक आधार पर इसे धरती पर ईश्वर के शासन के रूप में समझा जा सकता है। राजनीतिक तौर पर इसका अर्थ है एक संपूर्ण लोकतंत्र जहां रंग, नस्ल, संपत्ति, लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। जहां जनता का शासन हो। तत्काल और कम खर्च में न्याय मिले। उपासना की, बोलने की और प्रेस को आजादी मिले और यह सब आत्मनियमन से हो। ऐसा राज्य सत्य और अहिंसा पर निर्मित हो और वहां ग्राम और समुदाय प्रसन्न और समृद्ध हों।’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *