होम / जहां लगती थी मजदूरी की भीड़, अब वहां गूंजती है पढ़ाई की आवाज

पिकअप से मजदूरी नहीं, अब बस्ता लेकर स्कूल जाते हैं आदिवासी बच्चे

अमित भटोरे

मैत्री फेलो


खरगोन। कभी जिस आंगन में सुबह होते ही बच्चों की भीड़ जुटती थी। यहां से टिफिन लेकर पिकअप में सवार होकर बच्चे मजदूरी पर निकल जाते थे। दिनभर काम कर रात को वापस लौटते थे। उस आंगन की अब तस्वीर बदल गई है। यहां अब मजदूरी के लिए नहीं बल्कि पढ़ने के लिए बच्चे आते हैं। उत्साह और खुशी-खुशी बच्चे बैग लेकर यहां आते हैं और पढ़ाई करते हैं। खास बात यह है कि जो व्यक्ति कभी बच्चों को अपनी लोडिंग पिकअप पर बैठाकर मजदूरी करने ले जाता था, अब वहीं इन बच्चों को पढ़ाने में जुटा है। यह बदलाव है खरगोन जिले के भगवानपुरा क्षेत्र के आदिवासी गांव रायसागर का।उल्लेखनीय है कि जिले के आदिवासी अंचल में बड़ी संख्या में बच्चे और युवा पिकअप वाहनों में बैठकर मजदूरी के लिए दूसरे क्षेत्रों में जाते हैं। लेकिन ग्राम पंचायत रायसागर ने इस चलन को बदलने की कोशिश की है। गांव के युवा समाजसेवियों और ग्रामीणों के प्रयास से वर्ष 2024 में गांव से संचालित तीनों स्थानीय पिकअप बंद हो गई। अब गांव के लोग बाहरी क्षेत्रों से आने वाली पिकअप पर रोक लगाने के लिए फिर से अभियान शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।

रायसागर निवासी युवा समाजसेवी एवं सरपंच प्रतिनिधि सुभाष मेहता बताते हैं कि वर्ष 2016 के बाद गांव में पिकअप से मजदूरी पर जाने का चलन तेजी से बढ़ा। हर सुबह बच्चे, किशोर और युवा पिकअप में बैठकर दूसरे क्षेत्रों में काम करने निकल जाते थे। सुबह और देर शाम पिकअप गांव में डीजे बजाते हुए पहुंचती थी, जिससे गांव का माहौल भी प्रभावित होता था। मजदूरी करने जाने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई और कई परिवारों के सामने सामाजिक चुनौतियां भी बढ़ीं। वे बताते हैं कि सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं, ग्रामीणों और प्रशासन के सहयोग से गांव में लगातार जागरूकता अभियान चलाया गया। लोगों को समझाया गया कि कम उम्र में मजदूरी की बजाय शिक्षा पर ध्यान देना जरूरी है। अभियान का असर यह हुआ कि वर्ष 2024 तक गांव से चलने वाली तीनों स्थानीय पिकअप बंद हो गई और बच्चों को मजदूरी के लिए ले जाना रुक गया।

दोस्तों को देख खुद भी करने लगा मजदूरी
गांव का ही 14 वर्षीय राहुल (परिवर्तित नाम) अब नियमित स्कूल जाने लगा है। राहुल अपने पुराने दिन याद करते हुए बताता है कि पहले वो भी मजदूरी पर जाता था। दोस्त को मजदूरी पर जाते देखकर वह भी जाने लगा। करीब एक साल मजदूरी की। परंतु जब अपने भविष्य के बारे में सोचा और गांव के ही भैयाओं ने समझाया तो समझ आया कि मजदूरी करने की बजाए यह पढ़ाई के लिए सही समय है। यह समय यदि मजदूरी में चला गया तो आगे भी मजदूरी ही करना पड़ेगा। राहुल ने बताया कि वह भी पढ़ लिखकर इंजीनियर बनना चाहता है।

दो साल की मजदूरी, फिर लौटा स्कूल
गांव के विक्रम सिसोदिया ने बताया कि उनका 15 वर्षीय बेटा दो साल तक मजदूरी करने गया। इससे उसकी पढ़ाई छूट गई थी। परंतु उन्होंने बेटे को फिर से स्कूल भेजना शुरू किया है। वह छठी में अध्ययन कर रहा है। विक्रम ने बताया कि मजदूरी के जाने के दौरान उनका बेटा पढ़ाई से दूर हो गया था। उन्हें पहले लगता था कि मजदूरी पर जाना आम बात है। परंतु उन्हें जब शिक्षा का महत्व समझ आया और बेटे के भविष्य के बारे में सोचा, तो बच्चे को स्कूल भेजने लगे।

खुद की पिकअप बंद कर बच्चों को पढ़ा रहे
गांव के कैलाश नारवे कभी खुद अपनी पिकअप में बच्चों को मजदूरी के लिए ले जाते थे, लेकिन अब उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया है। वे अब परिवर्तन नाम की संस्था के साथ जुड़कर श्री रामकृष्ण विवेकानंद सेवा कुटीर में बच्चों को नियमित रूप से पढ़ा रहे हैं। कैलाश बताते हैं कि मैंने बच्चों को मजदूरी पर ले जाने का धंधा पूरी तरह बंद कर दिया है। अब मेरा पूरा ध्यान कुटीर और बच्चों के कल्याण पर है। अब मेरी पिकअप केवल सामान्य भाड़ा ढोती है, मजदूरों को नहीं। भाड़ा नहीं मिलने पर पिकअप घर पर ही खड़ी रहती है।

पालकों को बता रहे शिक्षा का महत्व
गांव के युवा राकेश डुडवे भी अन्य युवाओं के साथ गांव में लोगों की मानसिकता बदलने का काम कर रहे हैं। 30 वर्षीय राकेश स्नातक है। फिलहाल अपने गांव में ही खेती करते हैं। राकेश बताते हैं कि हम लोगों को समझाते हैं कि बाल श्रम मत करो। बच्चों को मजदूरी नहीं, शिक्षा की जरूरत है। गांव में ही स्कूल होने से बच्चों की पढ़ाई आसान है। उन्होंने बताया कि सरकार अब पढ़ाई के साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करवा रही है। इन योजनाओं का लाभ लेकर बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से ही बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होगा।

ग्रामीणों में धीरे-धीरे आ रही जागरूकता
गांव के युवा लोकेंद्र डुडवे भी बच्चों को मजदूरी छोड़कर पढ़ाई से जोड़ने के लिए प्रयास कर रहे हैं। वे भी अपने आसपास के लोगों को पढ़ाई का महत्व बता रहे हैं। वे गांव में ही छोटी से दुकान चलाते हैं। इससे ही उनका गुजारा होता है। लोकेंद्र बताते हैं कि हम ग्रामीणों को लगातार प्रेरित करते हैं ताकि वे बच्चों को काम पर भेजने के बजाय स्कूल भेजे। कई बार बच्चे दूसरे बच्चों को देखकर मजदूरी करने के लिए जाते हैं। इससे दूसरे बच्चों पर भी इसका असर हो रहा है। जरूरत है कि उन्हें बेहतर शिक्षा के लिए स्कूल भेजा जाए। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में अब ग्रामीणों में जागरूकता आ रही है।

पिअकप बंद होने से बढ़ी बच्चों की उपस्थिति
शासकीय हाईस्कूल रायसागर के प्रभारी प्राचार्य ओमप्रकाश वर्मा के अनुसार गांव के युवाओं और समाजसेवियों ने पिकअप बंद करने का अच्छा कार्य किया है। इससे स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ी है। उन्होंने बताया कि कपास चुनाई, मिर्च व टमाटर की तुड़ाई के सीजन में कई विद्यार्थी स्कूल नहीं आते हैं। ऐसे में उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। पढ़ाई में पिछड़ने से वे परीक्षा में भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। शैक्षणिक सत्र में एक से दो माह ऐसे हालात रहते थे। परंतु जब से पिकअप बंद हुई, तब से संख्या बढ़ी है। उन्होंने बताया कि युवाओं के साथ स्कूल के शिक्षकों ने भी पालकों को घर-घर जाकर समझाया।

10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ी उपस्थिति
उन्होंने बताया कि 18 वर्ष की आयु तक विद्यार्थियों की पढ़ाई उनका अधिकार है। उन्हें निशुल्क शिक्षा का अधिनियम सहित शासन की योजनाओं के बारे में बताया जाता है। साथ ही बाल मजदूरी और स्कूल छाेड़ने से विद्यार्थियों के भविष्य की चुनौतियों के बारे में भी समझाया जाता है। इस समझाइश से ही कई पालकों ने अपने बच्चों को मजदूरी की बजाय स्कूल भेजना शुरू किया है। इस सकारात्मक पहल से 10 से 15 प्रतिशत तक विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ी है। उन्होंने बताया कि छठी से आठवीं में 135 और नौवीं से दसवीं में 62 विद्यार्थी दर्ज हैं।

सरपंच कर रही युवाओं को प्रोत्साहित
गांव की ग्यारसीबाई मेहता 2022 से सरपंच हैं। उन्होंने इस मुहिम को मजबूती दी है। वे बताती हैं कि एक सरपंच के तौर पर उन्होंने समुदायों को जागरूक किया है। हमारा उद्देश्य रायसागर को पूरी तरह बाल श्रम मुक्त बनाना है। वे समय-समय पर युवाओं के साथ संवाद करती है। गांव में भी घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती हैं। ग्यारसीबाई का कहना है कि पहले के जमाने में पढ़ाई के लिए स्कूल और संसाधन नहीं थे। इससे वे ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाए। परंतु अब शासकीय हाईस्कूल होने के साथ ही पर्याप्त संसाधन हैं। शासन की योजनाओं का भी लाभ मिल रहा है।

बदलाव की कहानी बन सकती है उदाहरण
जरूरतमंद बच्चों की मदद करने वाले समाजसेवी रामेश्वर बड़ोले ने बताया कि रायसागर गांव की यह कहानी केवल एक गांव के बदलाव की नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के संकल्प की है, जिन्होंने बाल श्रम के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा खड़ा किया है। रायसागर की यह पहल अब पूरे निमाड़ अंचल के लिए एक उदाहरण बन सकती है। यहां युवाओं ने एक जज्बा दिखाते हुए न सिर्फ पिकअप से बच्चों की मजदूरी पर रोक लगाई, बल्कि बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए भी महत्वपूर्ण पहल की। इसका असर यह रहा कि बच्चे अब खेतों की मजदूरी छोड़ वापस स्कूलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

परिवार संस्था भी कर रही शिक्षा में सहयोग
परिवार के मध्यप्रदेश के चीफ एक्जिक्यूटिव सिद्धार्थ परमार ने बताया कि परिवार संस्था मध्यप्रदेश में पिछले आठ साल से कार्य कर रही है। प्रदेश के अलग-अलग गांवों में 1150 सेंटर संचालित हो रहे हैं। खरगोन जिले में 25 सेवा कुटीर संचालित हो रहे हैं। जहां आठवीं तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा और पोषण आहार उपलब्ध करा रहे हैं। संस्था का देवास में आवासीय शिक्षा परिसर है। यहां प्रदेशभर में करीब एक हजार बच्चे कक्षा छठी से 12वीं तक निशुल्क अध्ययन कर रहे हैं। सेवा कुटीरों में बच्चे पूरक शिक्षा और जीवन कौशल प्राप्त कर रहे हैं।

स्कूल के अतिरिक्त समय में हो रही पढ़ाई
परिवार संस्था के जिला समन्वयक रविशंकर बछानिया बताते हैं कि जिलेभर में 25 सेवा कुटीर संचालित हो रहे हैं। आदिवासी बहुल गांवों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए यह कुटीर चल रहे हैं। रायसागर में करीब 130 बच्चे दर्ज है। 70 से अधिक बच्चे नियमित रूप से आ रहे हैं। बच्चों को स्कूल के अतिरिक्त समय में सुबह और शाम को कक्षा में पढ़ाया जाता है। उन्हें नवोदय विद्यालय सहित अन्य विद्यालयों में प्रवेश परीक्षा की भी तैयारी कराई जाती है। बाल मजदूरी छोड़कर कई बच्चे कुटीर और स्कूलों में अध्ययन कर रहे हैं।

100 से अधिक पिकअप से जा रहे बच्चे
राज्य शिक्षा केंद्र के भगवानपुरा के बीआरसी राजेश कानूनगो ने बताया कि भगवानपुरा ब्लॉक में बाल मजदूरी सबसे बड़ी समस्या है। ब्लॉक सहित आसपास से 100 से अधिक पिकअप संचालित हो रहे हैं। इसमें सैकड़ों बच्चे बाल मजदूरी करने जा रहे हैं। भगवानपुरा को आकांक्षी ब्लॉक में शामिल किया गया है। भारत सरकार के प्रतिनिधि के दौरे के समय भी उन्हें इस समस्या के बारे में बताया गया था। करीब दो से ढाई हजार बच्चे मजदूरी करने जाते हैं। इनमें से कई बच्चे ड्राप आउट हो जाते हैं। लगातार मजदूरी करने से उनकी पढ़ाई में रुचि कम हो जाती है।

1138 बच्चे ड्राप आउट दर्ज किए गए थे
ड्राप आउट बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। शिक्षक गांव-गांव और घर-घर जाकर बच्चों के पालकों को समझा रहे हैं। उन्हें शिक्षा का महत्व और बच्चों के भविष्य के बारे में बता रहे हैं। इससे परिवारों में भी जागरूकता आ रही है। वे बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। ब्लॉक में वर्ष 2026-27 में 1138 बच्चे ड्रॉपआउट दर्ज किए गए थे। इनमें से अब 350 बच्चे ड्राप आउट शेष है। इन बच्चों को भी प्रवेश दिलाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। पिकअप से मजदूरी जाने वाले गांवाें में सरपंच, गांव पटेल सहित समजासेवियों से भी संपर्क किया जा रहा है। उन्हें भी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए सहयोग देने का आह्वान किया जा रहा है।

आदिवासी कर्मचारी संगठन भी आए आगे
आदिवासी कर्मचारी अधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष बादशाह कनासे ने कहा कि रायसागर की पहल यह संदेश देती है कि यदि ग्रामीण, सामाजिक संगठन और प्रशासन मिलकर काम करें तो गांव स्तर पर बदलाव संभव है। बाहरी वाहनों पर रोक लगाने की प्रस्तावित मुहिम के लिए भी पूरा सहयोग दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मॉडल आसपास के अन्य गांवों में भी अपनाना चाहिए। ताकि बच्चों को शिक्षा से जोड़कर उनका भविष्य बेहतर बनाया जा सके। उन्होंने भी संगठन के पदाधिकारियों के साथ कलेक्टर गुरु प्रसाद व जिला शिक्षा अधिकारी तेजसिंह राठौर से मिलकर बाल मजदूरी की समस्या के निराकरण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।

अब बाहरी पिकअप बनी नई चुनौती
सुभाष मेहता ने बताया कि स्थानीय पिकअप बंद होने के बाद भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अब आसपास के गांवों से कुछ पिकअप सुबह और शाम रायसागर पहुंचती हैं और कुछ बच्चों व युवाओं को मजदूरी के लिए ले जाती हैं। समाजसेवियों का मानना है कि इससे गांव में शुरू हुआ सकारात्मक बदलाव प्रभावित हो सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि किशोरावस्था में मजदूरी की आदत पड़ने से कई बच्चे पढ़ाई से दूर हो जाते हैं। गांव के युवाओं को समझाया जा रहा है कि शिक्षा ही भविष्य बदलने का सबसे मजबूत माध्यम है। स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर तलाशने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि युवाओं को बाहर न जाना पड़े।

प्रशासन से करेंगे कार्रवाई की मांग
मेहता ने बताया कि वे जल्द ही पुलिस और प्रशासन को आवेदन देकर बाहरी पिकअप पर कार्रवाई की मांग करेंगे। उनका कहना है कि यदि अवैध रूप से बच्चों और युवाओं को मजदूरी के लिए ले जाने वाले वाहनों पर समय रहते रोक लगाई जाए तो कई परिवारों के बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। उन्होंने कहा कि पुलिस और प्रशासन मिलकर बाल मजदूरी की नई परंपरा को बंद कर बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में ठोस योजना बना सकते हैं।

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