होम / भारत की भीतरी दासता से मुक्ति पर बहस

जब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था, तब स्पष्ट नीति बनने लगी थी कि बलात श्रम, बेगार और मानव व्यापार को खत्‍म करके ही हम भीतरी दासता से मुक्त हो सकेंगे. हम देखते हैं कि सात दशक गुज़र जाने के बाद भी भारत में बच्चों, किशोरवय व्यक्तियों, औरतों और महिलाओं का व्यापार होता है.

Similar Posts

  • गांधी ने जिस संविधान का सपना देखा

    गांधी देश के एक बड़े तबके लिए राष्ट्रपिता थे तो कइयों के लिए वह महात्मा या बापू थे। इतने वर्षों बाद भी गांधी की वैश्विक ख्याति और सत्य-अहिंसा के उनके विचारों की प्रासंगिकता बताती है कि एक विचार के रूप में गांधी की हत्या कर पाना संभव नहीं था। आइए समझने का प्रयास करते हैं कि गांधी के सपनों का भारत कैसा था और वह भारत के लिए कैसा संविधान चाहते थे?

  • संविधान की उद्देशिका में ईश्वर का नाम क्यों नहीं है?

    संविधान की आत्मा उसकी उद्देशिका में बसती है। उद्देशिका में उल्लिखित मूल्य ही देश को पंथनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक बनाने की राह दिखाते हैं। संविधान की उद्देशिका में कहीं भी…

  • आरक्षण, छुआछूत और संविधान सभा

    देश की संविधान सभा में आरक्षण को लेकर बहुत गंभीर और विस्तृत चर्चा हुई। विभिन्न तरह के मत सामने आए और आखिर में संविधान सभा ने सभी विचारों को ध्यान में…

  • किस धर्मांतरण को संविधान सभा ने माना था अवैधानिक

    भारत की संविधान सभा में धर्मांतरण के विषय पर गंभीर बहस हुई क्योंकि उपनिवेशवाद के उस दौर में ईसाई धर्मांतरण एक संवेदनशील विषय के रूप में उभर चुका था…

  • डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और संविधान

    संविधान के साथ डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का नाम इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि दोनों को एक दूसरे के बिना अधूरा कहा जा सकता है। उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता भी कहा जाता है। अक्सर यह सुनने में आता है कि भारत के संविधान का निर्माण डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने किया। परंतु क्या यह पूरा सच है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *